Thursday, 5 November 2020

जन्मदिन विशेष: विंध्य के सपूत एवं MP के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, दूरगामी सोच रखने वाले एक कर्मयोगी।

( 5 नवंबर 1930 - 4 मार्च 2011)


सीधी: किसी भी राज्य व्यवस्था (राजशाही हो या प्रजातंत्र) में नेतृत्व प्रदान करने के लिए कभी भी शीर्ष पद रिक्त नहीं रहता है जैसा कि इंग्लैण्ड के बारे में साहित्यकारों ने लिखा है कि “द किंग इज डैड, लांग लिब द किंग” परंतु हर व्यवस्था में अधिकतर ऐसे लोग नेतृत्व संभालते रहे हैं जो बिना नेतृत्व के गुणों को रखते हुए अकस्मात राजा या नेता बन जाया करते हैं। मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि जो हमारी ऐतिहासिक विरासत है, उसमें मात्र उन सभी प्रमुखों को ही स्वर्णिम शब्दों में याद किया जाता है जो ज्ञानी, गुणी और दूर दृष्टा होते है तथा समाज के कल्याण एवं विकास के लिए अपना योगदान देते है और ऐसी नीतियां देते है जो दीर्घकाल तक समाज के विकास में योगदान करती है। इतिहास ऐसे व्यक्तियों को हमेशा याद करता है।


हम ऐसा भी सोच सकते हैं कि इतिहास के एक विशेष संदर्भ में जब मध्य प्रदेश विकास के एक विशेष दौर से गुजर रहा था तब मध्य प्रदेश की बागडोर जिन के हाथों में भी थी वे रूढ़ियों से लड़ने बाले, एक बगावती युवा, एक न्यायप्रिय वकील, एक गंभीर अध्येता, आम आवाम का दुःख-दर्द समझने बाले व्यक्ति, कुशल प्रशासक, एक प्रजातांत्रिक नेता और दूरगामी सोच रखने वाले दूरदृष्टा के साथ भारतीय संस्कृति में गहरी समझ रखते थे जिन्हें हम कुंवर अर्जुन सिंह के नाम से जानते है।


कुंवर अर्जुन सिंह का जन्म एक तत्कालीन सामंती कुलीन परिवार-राव साहब चुरहट के एक पुत्र के रूप में हुआ, इसी कारण उन्हें विद्यालय से विश्वविद्यालय की शिक्षा-दीक्षा के लिए उस समय के शिक्षा केन्द्र (पूर्व के केम्ब्रिज) इलाहाबाद भेजा गया। जहॉं उन पर शिक्षा के दौरान उनके शिक्षकों और भारत के स्वंतंत्रता सेनानियों का उनपर प्रभाव पड़ा जो जीवन पर्यन्त उनके व्यवहार और नीतियों में परिलक्षित होता रहा । इसी दौर में उन्होनें महात्मा गांधी के दर्शन किये और पंडित जवाहरलाल नेहरू से आनंद भवन में भेंट की थी।


इन्हीं के प्रभाव में कुंवर अर्जुन सिंह ने अपने जीवन में दृढ़ता और संकल्प का विचार अपनाया जिसका उदाहरण यह है कि अपने एक गरीब ब्राह्मण मित्र के पक्ष में अपने पिता और चुरहट के तत्कालीन राजा राव शिवबहादुर सिंह के विरोध में उन्होंने रीवा के न्यायालय में गवाही देने की कोशिश की, जिसे उनके क्रांतिकारी एवं बगावती स्वभाव का अंग माना जाना चाहिए या फिर उसी विद्रोही व्यक्तित्व के द्वारा नरसिंम्हा राव सरकार से मंत्री पद त्यागना भी देखा जाना चाहिये। वकालत करते समय भी उन्होंने गरीब और निरीह व्यक्तियों के लिए ही लड़ाईयां लड़ी (विस्तार के लिए देखें कुंवर सा. की आत्म कथा ;एग्रेन ऑफ सेंड इन हाकर ग्लास ऑफ टाइम)।


छात्र जीवन में वे दरबार कॉलेज, रीवा के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे उसके बाद सुश्री सुशीला नैयर के आग्रह के वावजूद चुरहट से एक स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप से चुनाव लड़ा और सफल हुए एवं कुछ अन्य स्वतंत्र विधायकों के साथ मिलकर उन्होनें अपने आपको एक गुट के नेता के रूप में मध्यप्रदेश की विधान सभा में  स्थापित कर लिया था। तदुपरान्त पुनः एक कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और विजयी हुए। इसी दौर में वे श्री द्वारिका प्रसाद मिश्र की केबिनेट में मंत्री बने। फिर संविद सरकार आई और पुनः कांग्रेस की सरकार आयी तब शिक्षा मंत्री बने इसके बाद 1977 से 1980 तक मध्यप्रदेश की विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे, फिर 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री बने।


ये वही दौर है जिसमें कुंवर अर्जुन सिंह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गॉंधी के बिचारों को ठोस नीतियों में परिवर्तित कर मध्यप्रदेश के लिए कारगर नीतियां दी और उन्हें अपनी प्रशासनिक क्षमता के माध्यम से लागू किया जिससे आज के मध्यप्रदेश के सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने अन्य पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए महाजन समिति की सिफारिशें मंडल आयोग के बहुत पहले मध्यप्रदेश में लागू कर लाभ पंहुचाया। इसी प्रकार झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों के मालिकाना हक देना, और आदिवासियों के शोषण को रोकने के लिए तेंदु पत्ता का राष्ट्रीयकरण प्रमुख है।


इसी प्रकार कृषकों के विकास के लिए - मणिखेड़ा और बाणसागर जैसी वृहत्तर सिचाई और बिजली उत्पादन योजनाओं का निर्माण करना और मध्यप्रदेश के मानव संसाधनों को व्यवस्थित करने के लिए ब्लॉक स्तर पर उच्चशिक्षा के लिए महाविद्यालय खोलना एवं मालनपुर (भिण्ड), पीतमपुरा (इंदौर) औद्यागिक क्षेत्र एवं मंडीदीप (भोपाल) में ओद्योगिक कोरीडोर बनना, समस्त प्रदेश में बिजली का नेट वर्क 1984 तक स्थापित करना मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना उनकी दूर दृष्टि से ही संभव हो सका।


जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जब उनकी नीतियों की ख्याति देशव्यापी हो गई तब श्री राजीव गॉंधी ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में आमंत्रित किया। तब कुंवर सा. ने गंभीर राष्ट्रीय पंजाब समस्या का समाधान लोंगोंवाल समझौते के साथ समाप्त करने में गंभीर और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने राष्ट्र और क्षेत्रीय विकास के लिए मानव संसाधन के मंत्री के रूप में कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोले, प्रत्येक प्रांत में भारतीय प्रबंध संस्थान (आई.आई.एम.) और भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) खोले जिन में इंदिरा गॉंधी राष्ट्रीय आदिवासी विश्वविद्यालय प्रमुख है, जो भारत की आदिवासी जनसंख्या को व्यवस्थित करने और उच्च शिक्षित करने के लिए स्थापित किया गया।


केन्द्रीय नीति और निर्णय के केन्द्र में रहते हुए उन्होंनें बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड के विकास को केन्द्रित कर सतना से रीवा और टीकमगढ़ - खजुराहो रेल लाइन स्थापित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया,जिससे कि ये दोनों पिछड़े क्षेत्र राष्ट्र की विकास की मुख्यधारा में जुड़ गये जिसके लिए आज की और भविष्य की आने वाली पीढियां कुंवर अर्जुन सिंह के इस योगदान को सदैव याद रखेगीं।


कुंवर अर्जुन सिंह का बहुत अधिक लगाव भारतीय संस्कृति और लोक कलाओं से जीवनपर्यन्त रहा वे सदैव भारतीय गंगा-जमनी संस्कृति को बचाने एवं संवारने और संरक्षित करने का कार्य करते रहे, इसी लिए उन्होंने भारतीय साहित्य, लोक कलाओं, नाटक, चित्रकला और संगीत को बढाने और संरक्षित करने के लिए भोपाल में भारत भवन की स्थापना के साथ-साथ राष्ट्रीय आदिवासी संग्राहालय और विज्ञान का राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किया।


कुंवर अर्जुन सिंह पर लिखने के लिए बहुत है, पुस्तकें लिखी जा सकती है, परंतु उन्होंनें एक कर्मवीर की तरह भारतीय समाज में धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ प्रजातांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया जो हमेशा उनके कार्यो और व्यवहार से परिलक्षित होता रहा है। इसके लिए भविष्य में उनका योगदान सदैव सराहा जायेगा।


उनका एक गुण यह भी था कि उन्होंनें मध्यप्रदेश में दूसरी पंक्ति के हर जाति के नेताओं को प्रश्रय दिया और आगे बढ़ाया जो वर्तमान में छोटे-छोटे कस्बों से संभागों में वही नेतृत्व कांग्रेस की बागडोर संभाले हुए है और पंडित जवाहरलाल नेहरू की सर्वोदय, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय विकास एवं सामाजिक परिवर्तन की विचार धारा के साथ समाज को भविष्य की तरफ अग्रसर कर रहे है जिन्हें कुंवर अर्जुन सिंह ने आगे बढाया था।


इतने काम वे इसलिए कर सके क्योंकि हमेशा अध्ययन करते रहते थे और साहित्य और दर्शन से उनका गहरा लगाव था। समाज की भावी समस्याओं के समाधानों के लिए नेतृत्व विकसित करते हुए व्यक्ति वे नीतियां बनाते रहे। उन्होंने अनेक संस्थायें खोली और इसीलिए हम उन्हें याद करते रहे और याद करते रहेंगे क्योंकि वे जातियों और कठमुल्लापन के दायरे से बाहर सामाजिक परिवर्तन के लिए ही पूरे जीवन कार्य करते रहे।

(यह आलेख, स्व. अर्जुन सिंह के पुत्र एवं MP विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के फ़ेसबुक से लिया गया है।)

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