Thursday, 4 June 2020

आखिर शिवराज सरकार का, क्यों नहीं हो पा रहा मंत्रिमंडल विस्तार? विंध्य का समीकरण भी दो दिग्गजों के बीच उलझा।


भोपाल: मध्यप्रदेश में कोरोना का संकट बरकरार है। कोरोना पॉजिटिव मरीजों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। जब मध्यप्रदेश में कोरोना दस्तक दे रहा था, उसी वक़्त तत्कालीन कमलनाथ रकार का तख्ता पलट हो गया था, और कमलनाथ सरकार गिरनें के बाद कोरोना के चलते 24 मार्च से शुरू हुए लॉकडाउन से कुछ घंटे पहले शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर सूबे के मुख्यमंत्री के रूप में सपथ ली थी। लेकिन जैसे ही शिवराज सिंह सीएम की कुर्सी पर विराजमान हुये, वैसे ही कोरोना का कहर भी मध्यप्रदेश में तेजी से फैलनें लगा। इन्दौर में हालात लगातार बिगड़ते रहे। शुरुआती दिनों में सीएम शिवराज सिंह वन मेन आर्मी की तरह मैदान में डटे रहे। लेकिन बाद में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भारी दबाव के चलते एक महीनें बाद मंत्रिमंडल का गठन किया और पांच मंत्री नियुक्त कर दिए गए। लेकिन, अब मंत्रिमंडल विस्तार के लिये मिल रही है सिर्फ़ तारीख पे तारीख। कारण यह है की, जिन कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे के कारण सरकार बनी वे भी मंत्रिमंडल के विस्तार का इंताजर कर रहे हैं। साथ ही भाजपा विधायक भी मंत्रिमंडल में अपनी दावेदारी को छोड़नें को तैयार नही हैं।



भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायक ऐसे हैं, जो वरिष्ठता में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समकक्ष हैं, साथ ही पंद्रह साल की सरकार में लगातार मंत्री भी रहे हैं। प्रतिपक्ष के नेता रहे गोपाल भार्गव को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। शिवराज सिंह ने 21 अप्रैल को जिन पांच विधायकों को मंत्री बनाया था उनमें तुलसी सिलावट एवं गोविंद राजपूत, सिंधिया समर्थक कोटे से हैं। भाजपा कोटे से सिर्फ तीन चेहरों को जगह दी गई थी, जिसमें नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल और मीना सिंह शामिल हैं। नरोत्तम मिश्रा और कमल पटेल दोनों ही केन्द्रीय नेतृत्व की पंसद पर मंत्री बने हैं। शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार अपनी पसंद नापसंद के आधार पर करना चाहते हैं, लेकिन, केन्द्रीय नेतृत्व राजनीतिक संतुलन को साधकर आगे बढ़ना चाहता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपेक्षा का भी कोई संदेश केन्द्रीय नेतृत्व नहीं देना चाहता।



बुंदेलखंड क्षेत्र में नही बैठ पा रहा समीकरण।
सिंधिया के साथ जिन 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ी थी, उनमें छह कमलनाथ मंत्रिमंडल में मंत्री थे। भाजपा की सरकार के गठन के बाद शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में छह मंत्री सिंधिया समर्थक रखने की बाध्यता के कारण भाजपा का आतंरिक गणित गड़बड़ा रहा है। सबसे ज्यादा खींचतान बुंदेलखंड का समीकरण बैठानें में है। बुंदेलखंड क्षेत्र से भाजपा के दो बड़े चेहरे गोपाल भार्गव एवं भूपेन्द्र सिंह आत हैं। दोनों ही सागर जिले की विधानसभा सीटों से चुनकर आते हैं। वहीं, सिंधिया समर्थक गोविंद राजपूत भी सागर जिले के ही हैं। राजपूत के मंत्री बनाए जाने के बाद सागर जिले से एक और विधायक को मंत्री बनाया जा सकता है। शिवराज सिंह चौहान अपने समर्थक भूपेन्द्र सिंह को मंत्रिमंडल में लेना चाहते हैं, लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व गोपाल भार्गव की अनदेखी नहीं करना चाहता।



सिंधिया समर्थकों की राह नही है आसान।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के चलते मंत्री पद छोड़ने वाले नेताओं की राह भाजपा में आसान नजर नहीं आ रही है। गौरतलब है की, भाजपा में शामिल होने के लिए 22 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। ये सभी वर्तमान में विधायक नहीं है। मंत्री बनाए गए तुलसी सिलावट और गोविदं राजपूत भी वर्तमान में विधायक नहीं है। भारतीय जनता पार्टी में एक धड़ा इस बात पर जोर दे रहा है कि सिंधिया समर्थकों को विधायक निर्वाचित होने के बाद ही मंत्री बनाया जाना चाहिए।



सिंधिया अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह दिलानें के लिये लगा रहें जोर।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सिंधिया चाहते हैं कि उनके ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह मिले। इसके पीछे वजह यह बतायी जा रही की, मंत्री होने से उपचुनाव जीतना आसान हो जाएगा। जोर इस बात पर भी है कि अनुसूचित जाति वर्ग के ज्यादा से ज्यादा लोगों को मंत्री बनाया जाना चाहिए। सबसे ज्यादा विधानसभा के उपचुनाव इस वर्ग के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों पर हैं। ऐदल सिंह कंसाना और बिसाहूलाल सिंह को लेकर भी भाजपा में असमंजस दिखाई दे रहा है। ये दोनों सिंधिया समर्थक नहीं हैं लेकिन, कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं।



विंध्य का समीकरण दो दिग्गजों के बीच उलझा।
2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार एवं सत्ता जानें के बाद शिवराज सिंह की राजनैतिक स्थिती थोड़ी अलग हुई है, वजह यह है की उनके तेरह साल के मुख्यमंत्रित्व काल में जो नेता अलग-थलग कर दिए गए थे,अब वे बदली हुई राजनीतिक परिस्थतियों में लामबंद होते दिखाई दे रहे हैं।



पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला की दावेदारी पड़ रही कमजोर।
विंध्य अंचल में शिवराज सिंह चौहान के करीबी मानें जानें वाले रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ला को मंत्री बनाए जाने का विरोध हो रहा है। साथ ही राजेंद्र शुक्ला द्वारा प्रवासी मजदूरों को वापस लानें के लिये अभिनेता सोनू सूद से मदद मांगनें का मामला तूल पकड़ लिया है एवं भाजपा की खूब किरकिरी हुई है। हला की केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राजेन्द्र शुक्ला को मंत्रिमंडल में जगह दिलानें को लेकर अड़े हुये हैं, इस लिहाज से देखा जाय तो अभी भी पूर्व मंत्री राजेन्द्र शुक्ला रेस से बनें हुये हैं।


सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला नें ठोंकी दावेदारी।
अब इसी अंचल से आनें वाले दूसरे शुक्ला यानी सीधी विधायक केदार नाथ शुक्ला ने अपनी दावेदारी ठोक दी है। इस समय सीधी सहित समूचे विंध्य में यह चर्चा है, की सीधी विधयाक एवं वरिष्ठ नेता केदारनाथ शुक्ला इस बार सरकार का हिस्सा बनेंगें और मंत्रिमंडल में शामिल होंगें। साथ ही यह भी चर्चा जोरों पर है की, उनका नाम विधानसभा अध्यक्ष के लिये भी तेजी से उभरा है। हला की वरिष्ठ भाजपा नेता डा. सीताशरण शर्मा का नाम भी विधानसभा अध्यक्ष की लिस्ट में हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विश्वसनीय डा. शर्मा ने वर्ष 2013 से 2018 तक विधानसभा का बहुत ही संजीदा तरीके से संचालन किया था।

कुछ तथ्य ऐसे भी, जो जा सकतें हैं सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला के खिलाफ।
सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला अपनें बेबाक राय और बोल के लिये जानें जाते हैं और वो अपनी पार्टी के खिलाफ भी बोलतें रहें है, ऐसे में कुछ ऐसे तथ्य हैं जो उनके खिलाफ भी जा सकतें है।


सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला के सीधी सांसद रीति पाठक से मतभेद।
सीधी से भोपाल तक सीधी विधायक एवं सांसद की आपसी तकरार के बारें में सब को पता है। दरअसल सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला और सांसद रीति पाठक के रिश्ते बिल्कुल समान्य नही है, और दोनों एक दूसरे के बारे मे मीडिया में भी बयानवाजी करनें से पीछे नही हटते। हालत तो यहां तक पहुंच गये थे की सीधी विधायक द्वारा सीधी सांसद पर व्यक्तिगत छींटाकशी की गयी थी, जिसके जवाब में सांसद रीति पाठक ने, सीधी विधायक के मानसिक स्थिति पर ही सवालिया निशान लगा दिया था, और शिवराज सिंह को बीच बचाव करना पड़ा था।

सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला द्वारा पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के खिलाफ की गई टिप्पणी।
झाबुआ उपचुनाव हारने के बाद  भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सीधी से विधायक केदारनाथ शुक्ला ने अपनी ही पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की काबिलियत पर सवालिया निशान लगाते हुए यह तक कह डाला था कि उन्हीं के असक्षम नेतृत्व के चलते पार्टी चुनाव हारी है। शुक्ल ने यहां तक कह दिया कि  राकेश सिंह के नेतृत्व में पार्टी चौपट हो रही है और उन्हें जल्द पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाना चाहिए। केदारनाथ शुक्ला का इतना बोलते ही पार्टी में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में पार्टी नें केदारनाथ शुक्ल की इस बयान बाजी को अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस थमा दिया था।

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