Friday, 31 January 2020

म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कुंवर अर्जुन सिंह की स्मृति में "यादें अर्जुन सिंह" कार्यक्रम का आयोजन, 8 फरवरी को छत्रसाल स्टेडियम सीधी में।


सीधी: मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के दिग्गज राजनेता स्व. कुंवर अर्जुन सिंह की स्मृति में आठ फरवरी को ‘यादें अर्जुन सिंह’ द्वितीय सोपान के तहत अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया जाएगा। यह जानकारी कुंवर अर्जुन सिंह सर्वहारा कल्याण मंच की तरफ से अरुण सिंह नें "सीधी CHRONICLE" को दूरभाष पर दी। 



उन्होनें बताया कि, विगत वर्ष की भांति इस वर्ष भी कुंवर अर्जुन सिंह की याद में ‘यादें अर्जुन सिंह’ द्वितीय सोपान कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि छत्रसाल स्टेडियम में आठ फरवरी को शाम आठ बजे से अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस आयोजन में देश के कई प्रतिष्ठित कवि एवं शायर अपनी रचनाओं के माध्यम से कुंवर अर्जुन सिंह को याद करेंगे। उन्होंने बताया कि मंच के संरक्षक पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल के मार्गदर्शन में कार्यक्रम की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

कुंवर अर्जुन सिंह का जीवन परिचय।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के दिग्गज राजनेता स्व. कुंवर अर्जुन सिंह का जन्म 5 नवंबर 1930 को हुआ था। विंध्य की माटी के सपूत एक छोटी सी जागीर में जन्म लेकर भारत की राजनीति के क्षितिज पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कुंवर अर्जुन सिंह की यादों का अब अवशेष शेष रह गया है। चुरहट जागीर के राव घराने में 5 नवंबर 1930 को जन्में अर्जुन बीमारी के बाद राज्यसभा सदस्य रहते हुए 4 मार्च 2011 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।



निर्दलीय चुनाव लड़कर, राजनीति की शुरूआत की।

अर्जुन सिंह ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत किसी पार्टी के सहारे नहीं अपने बल पर शुरू की थी।साल 1952 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इलेक्शन कैंपेन के दौरान अर्जुन सिंह के पिता राव शिवबहादुर सिंह को इलेक्शन कैंडिडेट के तौर पर घोषित किया था। लेकिन रीवा पहुंचने के बाद नेहरू ने अपनी स्पीच में ये कह दिया कि उनकी पार्टी से कोई कैंडिडेट नहीं है। इसके बाद अर्जुन सिंह के पिता निर्दलीय इलेक्शन लड़े लेकिन वो उस वक्त जीत नहीं पाए। जिसका अर्जुन सिंह पर गंभीर असर हुआ। और इसी अपमान का बदला लेने के लिए वे व्यक्तिगत तौर पर राजनीति में आ गए और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

जब पहली बार बने विधायक।
अर्जुन सिंह अपने पिता का बदला लेने के लिए राजनीति में सक्रिय हो गए। साल 1957 में अर्जुन सिंह कांग्रेस का टिकट लेने के लिए तैयार नहीं हुए और कांग्रेस से अपनी हार का बदला लेने के लिए निर्दलीय उमीदवार के रूप में विधानसभा  चुनाव लड़े और विधायक बनें।

जब नेहरू ने अर्जुन सिंह को बुलाया दिल्ली।
अब अर्जुन सिंह विधायक बन चुके थे, और कांग्रेस के इस मिथक की "यदि कांग्रेस किसी को लैंप-पोस्ट टिकट दे तो उसकी जीत पक्की है" को तोड़ने में सफल रहे थे।
साल 1961 में मध्यप्रदेश विधानसभा में एक प्रस्ताव रखा गया कि सभी विधायकों को अपनी सम्पत्ति का सत्यापन करना होगा। इसके बाद अर्जुन सिंह ने नेहरू को एक पत्र लिखा जिससे प्रभावित होकर उन्होंने अर्जुन सिंह को दिल्ली बुला लिया। चर्चा के बाद जब अर्जुन सिंह निकले तो नेहरू से खूब प्रभावित थे और कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा कर दिए।

जब बनें मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष।
1977 में कांग्रेस अल्पमत में आ गई और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अर्जुन सिंह को बनाया गया। अर्जुन सिंह ने नेता प्रतिपक्ष बनकर जिस तरह से काम किया शायद ही भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं। उन्होंने तीन साल नेता प्रतिपक्ष रहते हुए तत्कालीन जनता सरकार के तीन सीएम बदलने पर मजबूर कर दिए थे। जिसमें कैलाश जोशी , वीरेंद्र सकलेचा और सुंदरलाल पटवा शामिल हैं। इस बाद राष्ट्रपति लागू होने के बाद इलेक्शन कराए गए। जिसमें कांग्रेस बहुमत में आ गयी।

तीन बार रहे मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री।
समय बदला, अर्जुन सिंह इंदिरा और संजय के करीबी होने लगे। इंदिरा दतिया के मंदिर गईं तो भोपाल में अर्जुन सिंह के यहां रुकीं। संजय गांधी चुनाव प्रचार के लिए चुरहट तक गए। 1980 आया, कांग्रेस चुनाव जीती। विधायक दल का नेता चुनने के लिए बड़े-बड़े नाम आये।केपी सिंह, विद्याचरण शुक्ला, प्रकाशचंद सेठी, शिवभानु सिंह सोलंकी और अर्जुन सिंह, अभी के मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम भी था लेकिन उन्होंने अपने वोट और अपना साथ अर्जुन सिंह को दे दिया था। मुख्यमंत्री  चुनने का दूसरा दौर चला। पर्यवेक्षक के तौर पर आये प्रणव मुखर्जी की उपास्थिती में मतपेटी में वोट डाले गए।मतपेटी को दिल्ली मंगवा लिया गया।इसके बाद तमाम विरोधी अटकलों के बीच अर्जुन सिंह को कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री बनाया। साल 1980 में पहली बार वे मुख्यमंत्री बने।  इसके बाद उन्होंने दूसरी बार एक साल और तीसरी बार भी एक साल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।

जब उन्हें बनाया गया पंजाब का राज्यपाल।
मप्र के मुख्यमंत्री रहते हुए राजीव गांधी द्वारा अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाया गया। उस समय पंजाब की हालत अत्यंत दयनीय थी। राजनीतिक विष्लेशकों की मानें तो अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल उन्हें परास्त करने के लिए बनाया गया था। उन दिनों पंजाब में गदर मारपीट मची हुई थी। किंतु अर्जुन के माथे पर चिंता की लकीरे नहीं देखी गई।

जब अर्जुन सिंह नें कहा, चिंता की जरूरत नहीं।
उनके द्वारा सीधी से पंजाब के लिए रवाना होते समय उपस्थित जनसमुदाय से बस इतना कहा गया था कि जिंदा रहे तो जल्द आप लोगों के बीच आएंगे, कोई चिंता की जरूरत नहीं है। उनके इस बोल से लोगों के आंखों में आंसू तैरने लगा था। अर्जुन सिंह अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय देते हुए आतंकवाद से झेल रहे पंजाब में जल्द ही राजीव-लोगोवाल समझौता कराकर पंजाब में शांति बहाल कराई गई। इस ऐतिहासिक कार्य के लिए उस दौर में अर्जुन सिंह को भारत रत्न पुरस्कार देने की भी मांग उठी थी।

फिर केंद्र की राजनीति में हुये सक्रिय।
नई दिल्ली की लोकसभा सीट तत्कालीन सांसद की मौत होने से खाली हो गई थी। अर्जुन सिंह को वहां से चुनाव लड़ाने का निर्णय कांग्रेस ने लिया। उनके विरोधी कुनबे में खुशी थी कि दिल्ली में बाहरी व्यक्ति बाटर लो साबित होगा। किंतु अर्जुन सिंह दिल्ली के चक्रब्यूह को तोड़कर चुनाव जीतने में सफल रहे तब उन्हें केंद्र सरकार मे संचार मंत्री बनाया गया। उसके बाद राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिंहा राव सरकार में मानव संसाधन मंत्री से नवाजा गया। उसके बाद मनमोहन सिंह सरकार मे मानव संसाधन मंत्री रहे।

अर्जुन सिंह की सेवाभावना, को आगे बढ़ाते उनके पुत्र अजय सिंह।
4 मार्च 2011 को अर्जुन सिंह की दिल्ली में मौत हो गई, लेकिन उनके उनके पुत्र अजय सिंह अपनें पिता के पदचिन्हों पर चलकर आज भी जनता की सेवा में लगे हुये हैं। अजय सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति में दिग्गज नेताओं में शुमार है, वे मध्यप्रदेस सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। साथ ही वो मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके है।

पोता अरुणोदय सिंह बॉलीवुड में नाम कमा रहा है।
अर्जुन सिंह के पोते एवं अजय सिंह के बेटे, अरुणोदय सिंह फिल्मजगत में अपना नाम कमा रहे। वो ये साली जिन्दगी, जिस्म-2, मैं तेरा हीरो और मोहन जोदाडो जैसी बॉलीवुड फिल्मों से अपनें अभिनय का लोहा मनवा चुके है।

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